Know Everything About Statue of Peace
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क्या आप जानते हैं की स्टेचू ऑफ पीस किस जैन महापुरुष की मूर्ती है | Know Everything About Statue of Peace

16 नवंबर को दोपहर 12:30 बजे जैन भिक्षु आचार्य विजय वल्लभ सुरिश्वर जी महाराज की 151 वीं जयंती समारोह पर उनकी मूर्ति का अनावरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया। आचार्य बल्लभ की 151 इंच ऊंची अष्टधातु यानी कि 8 धातुओं से बनाई हुई यह प्रतिमा जमीन से 27 फीट ऊंची है तथा इसका भार 1300 किलो बताया जा रहा है। यह मूर्ति राजस्थान के पाली जिले में स्थित विजय वल्लभ साधना केंद्र, जैतपुरा में स्थापित की गई है। इन्हीं आचार्य विजय वल्लभ सुरिश्वर जी महाराज की प्रतिमा को 'स्टैचू ऑफ पीस' के नाम से माना गया है।

'स्टैचू ऑफ पीस' के नाम से प्रसिद्ध यह मूर्ति 8 धातुओं से निर्मित है, जिसमें तांबा प्रमुख धातु है। आचार्य विजय वल्लभ सुरिश्वर जी महाराज एक जैन संत थे तथा संत के रूप में ही उन्होंने अपने पूरे जीवन का निर्वाह किया। वे सादगी पूर्ण जीवन जीते थे और निस्वार्थ व समर्पित भाव से भगवान महावीर के संदेशों को लोगों तक पहुंचाने का कार्य किया करते थे। 

आचार्य विजय वल्लभ संवत् 1870 में गुजरात के बड़ौदा में जन्मे थे। वे श्वेतांबर धारा के प्रमुख संतों में से एक थे। उनका जन्म भले ही गुजरात में हुआ हो परंतु उनकी कर्मभूमि सदैव से पंजाब रही है और पंजाब में ही उन्होंने अपने अधिकांश जीवन को का निर्वाह किया है। वह एक साधारण से पुरुष थे, जो स्वयं खादी से बने वस्त्र पहनते थे और उन्होंने आजादी के समय हुए खादी स्वदेशी आंदोलन में भी काफी सक्रिय भूमिका निभाई थी।

जब देश में बंटवारे का समय था तो उनका स्थान पाकिस्तान में गुजरावाला में चतुर्मास था, मगर 1947 के सितंबर में ही वे पैदल यात्रा करके भारत वापस आ गए। इस समय वे अकेले वापस नहीं आए बल्कि अपने अनुयायियों को भी साथ लेकर आए और उन्होंने अपने साथ-साथ अनुयायियों का पुनर्वास सुनिश्चित किया। 

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अहिंसा के अपने पाठ को वे सक्रिय रूप से सभी को पढ़ाते चले गए। आजादी के लगभग 7 सालों बाद 1954 में मुंबई में उनकी मृत्यु हो गई। लोग उन्हें कितना मानते थे यह पता इस बात से चलता है कि उस समय 2 लाख से अधिक श्रद्धालुओं की भीड़ उनके अंतिम दर्शन के लिए इकट्ठा हो गई थी।

आचार्य विजय वल्लभ ने पूरे देश में घूम-घूम कर पैदल ही यात्राएं की। 67 वर्षों तक वे उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, मध्य-प्रदेश, महाराष्ट्र और सौराष्ट्र जैसे अनेक प्रांतों में घूमते रहे। इस दौरान उन्होंने आचार्य महावीर जैन विश्वविद्यालय के साथ-साथ 50 से भी  अधिक शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की तथा इन संस्थानों की स्थापना में सहयोग प्रदान किया। 


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उन्होंने अनेक पूजाओं, छंद कविताओं तथा अनेक ग्रंथों की रचना भी की थी। उन्होंने पंजाब को अपनी कर्मभूमि मानते हुए वहां ही अपने उपदेश दिए। उनके उपदेशों से प्रेरित होकर लोग उन्हें 'पंजाब केसरी' कहा करते थे। वे जैन संप्रदाय की शिक्षाएं और उसके उत्थान के लिए कई सारे कार्य करते रहे। इन शिक्षाओं को वह लोगों तक फैलाने का कार्य करते और उनके द्वारा लोगों के जीवन को सुचारू रूप से निर्वाह कराने का प्रयत्न करते, इसी कारण उन्हें 'युग प्रधान' भी कहा जाने लगा। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने भाषण में उनके जीवन मूल्यों से सीख लेने की बात की है।


अंतरिक्ष प्रकाश ज्योति की तरह हैं संत


16 नवंबर को 'स्टैचू ऑफ पीस' का अनावरण करने के बाद पीएम मोदी द्वारा कहा गया-"मुझे विश्वास है कि यह स्टैचू ऑफ पीस विश्व में शांति, अहिंसा और सेवा का एक प्रेरणा स्रोत बनेगी। आप भारत का इतिहास देखें तो महसूस करेंगे, जब भी भारत को आंतरिक प्रकाश की जरूरत हुई है, तो संत परंपरा से कोई न कोई उदय हुआ है। कोई ना कोई बड़ा संत हर कालखंड में हमारे देश में रहा है, जिसने उस कालखंड को देखते हुए समाज को दिशा दी है। आचार्य वल्लभ जी ऐसे ही एक संत थे।"

"महापुरुषों का, संतों का विचार इसलिए अमर होता है क्योंकि वह जो बताते हैं, वही अपने जीवन में जीते हैं। आचार्य वल्लभ जी कहते थे कि साधु महात्माओं का कर्तव्य है कि वह अज्ञान, कलह, बेगारी, आलस, व्यसन और समाज के बुरी रीति-रिवाजों को दूर करने के लिए प्रयत्न करें।"

इन्हीं संतो के जीवन से प्रेरणा लेकर हमें अपने देश को आगे बढ़ाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए तथा अपने जीवन में यह सुनिश्चित करना चाहिए, कि बुराई से दूर रहें और सच्चाई का जीवन जिएं।

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