Biography of Shri Avdheshanand Maharaj ji
कुम्भ 2021

कौन है स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज जो है जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर

स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज नागा साधुओं के सबसे बड़े और पुराने (भारत में) समूह वाले जूना अखाड़े के प्रसिद्ध आचार्य महामण्डलेश्वर के रूप में संसार में विख्यात हैं। एक आध्यात्मिक गुरु होने के साथ-साथ वे हिंदू धर्म के महान संत और एक लेखक भी हैं। स्वामी जी ने अखाड़े में करीब 10 लाख से अधिक संन्यासियों को दीक्षा दी है। 


हरिद्वार में स्थित जूना अखाड़े के पीठाधीश्वर स्वामी श्री अवधेशानंद गिरी महाराज एक उत्कृष्ट व्यक्तित्व और साधु समाज के आदर्श के रूप में संपूर्ण संसार को मार्गदर्शन दे रहे हैं। वे लाखों लोगों के आध्यात्मिक गुरु होने के साथ-साथ उससे भी अधिक लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। स्वामी जी एक प्रतिष्ठित वक्ता भी हैं जो मधुर भाषी होने के साथ हृदय में अगाध प्रेम को लेकर अपने प्रवचनों के द्वारा संपूर्ण सृष्टि के स्रोता गणों के मन में दूसरों के प्रति निष्कपट की भावना तथा स्वयं के लिए दृढ़ निश्चय व सचेत होने की प्रेरणा पैदा करने वाले एक महान पुरुष हैं। 


 महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद जी कार्तिक मास की पूर्णिमा को उत्तर प्रदेश के खुर्जा में जन्मे थे। इनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे स्वयं में रहने वाले तथा खिलौने आदि में दिलचस्पी ना दिखाने वाले बच्चे थे। उन्हें परिजनों के साथ अक्सर पूर्व जन्म की घटना पर चर्चा करते हुए देखा जाता था। परिजनों का मानना है कि मात्र ढाई वर्ष की उम्र में स्वामी जी अपना घर छोड़कर चले गए थे परंतु बालपन में परिजनों ने उन्हें समझाया और वापस घर ले आए। इसके बाद आध्यात्मिक ज्ञान पाने की उनकी इच्छाशक्ति बढ़ती चली गई। 


शिक्षा


स्वामी जी की शिक्षा प्रारंभिक तौर पर उत्तर प्रदेश राज्य के खुर्जा में ही संपन्न हुई। कहा जाता है कि जब वह नवीं कक्षा के छात्र थे उस समय उनके क्षेत्र में एक साधु आए थे। तब उन्हें पहली बार साधु से परिचय और उनकी सिद्धियों को करीब से देखने का मौका मिला। इसके बाद वे गर्मियों के अवकाश में आध्यात्मिक अध्ययन और योग के अभ्यास के लिए आश्रम गए, जहां उन्हें कुछ समय तक रहना था।


1 दिन आश्रम में रात के समय स्वामी जी ने एक अन्य साधु को लगभग 1 फुट जमीन के ऊपर हवा में तैरते हुए देखा। यह देख कर उनके मन में स्वयं भी ऐसा करने का विचार उत्पन्न हुआ। इस पर आश्रम के अन्य अधिकारियों द्वारा उन्हें यह बताया गया कि उन्होंने सिद्ध योगी की साधना को देखा है परंतु दोबारा इस प्रकार का कृत्य वे ना करें। यह बात जब साधु को पता चली तो उन्होंने कहा कि इस बच्चे ने जो कुछ भी किया है उसमें गलत क्या किया है? वैसे भी यह एक साधु बनने जा रहा है और साधु बनने से पहले उसे इन सब के बारे में जानना आवश्यक है। 


इस प्रकार सिद्ध योगी साधु के द्वारा पहले ही यह भविष्यवाणी कर दी गई थी कि यह बच्चा आगे चलकर एक सिद्ध गुरु के रूप में ख्याति प्राप्त करेगा। इसके बाद स्वामी जी की कॉलेज की शिक्षा दिल्ली में संपन्न हुई। वहां वे बढ़-चढ़कर कविता रचना तथा वाद-विवाद के साथ-साथ प्रार्थना आदि में भाग लिया करते थे। जिससे उनका एक प्रखर वक्ता होना सुदृढ़ होता गया और वे हजारों लोगों के मार्गदर्शक बनते चले गए। 


गुरु जी से मिलन


सन 1980 के दशक में स्वामी अवधेशानंद हिमालय में अपनी गहन साधना और तप के लिए चले गए। तभी से उन्होंने घर छोड़ दिया और सन्यास जीवन में पूरी तरह से रम गये। वे हिमालय की कंदराओं और जंगलो में कई महीनों तक भी भटकते रहे परंतु उन्हें शांति नहीं मिली। तब उन्होंने यह सोचा कि इसके लिए किसी ना किसी गुरु की साधना आवश्यक है अर्थात उन्हें इस साधना को पाने के लिए पहले एक गुरु को ढूंढना चाहिए। इसी समय वे स्वामी अवधूत प्रकाश महाराज से मिले। अवधूत प्रकाश महाराज पहले से ही स्वयं को खोज चुके थे। उन्होंने योग और ध्यान पर विशेष सिद्धि प्राप्त कर ली थी और वेदों पुराणों तथा अन्य सभी के बारे में उनका ज्ञान श्रेष्ठता की ओर बढ़ चुका था। उन्होंने कई वर्षों तक तप कर के असल ज्ञान को प्राप्त कर लिया था। उनसे मिलकर अवधेशानंद जी अत्यंत प्रसन्न हो गए और उन्हें अपना गुरु बना लिया। यहीं से स्वयं से मिलने की उनकी साधना की शुरुआत हुई और इस यात्रा में वे आगे बढ़ते चले गए। 


सन् 1985 में वे हिमालय पर्वत माला से गहन साधना और तप करके आए। सिद्धि को प्राप्त करने के बाद उनका मिलन निवृत्र शंकराचार्य  स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी जी से हुआ। अब उनका सन्यास जीवन में प्रवेश आरंभ हो चुका था। 


जूना अखाड़ा में बने आचार्य महामंडलेश्वर


स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज पहले निरंजनी अखाड़े में रह रहे थे। तत्पश्चात जूना अखाड़े से जुड़ने के बाद उन्हें स्वामी अवधेशानंद गिरी के नाम से संबोधित किया जाने लगा। इसके बाद सन 1998 में जूना अखाड़ा के सभी संतजनों ने उन्हें आचार्य महामंडलेश्वर की उपाधि दी। 


दरअसल जूना अखाड़ा हरिद्वार में स्थित भारत वर्ष का सबसे बड़ा और विशाल सन्यासियों का एक समूह है जिसमें लाखों की संख्या में नागा साधु रहते हैं। वे वहां स्वाध्याय करते हैं तथा आध्यात्मिक चेतना और विभिन्न क्षेत्रों में तप करके अपने मठ-आश्रमों आदि का समस्त जनता में प्रचार-प्रसार के साथ-साथ उनके मन में भी अध्यात्म का संचार करते हैं। इस विशाल नागा सन्यासियों के समूह का नेतृत्व आचार्य महामंडलेश्वर श्री अवधेशानंद गिरी महाराज करते हैं और वे इसके पीठाधीश कहलाते हैं। 

आचार्य इस अखाड़े के महामंडलेश्वर होने के साथ-साथ हिंदू धर्म के कई संप्रदायों के तथा प्रमुख आचार्यों की संस्था के भी अध्यक्ष हैं तथा कई सारे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन्हें ससम्मान आमंत्रण भेजकर बुलाया जाता है। स्वामी जी द्वारा कई सारे जलवायु परिवर्तन संबंधी तथा विभिन्न धर्मों में भाईचारे के लिए किए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में अध्यक्षता भी की गई है। उन्हें भारतीय दर्शन तथा वेद वेदांतों का गहरा तथा बहुमुखी ज्ञान है और 2008 में ही उन्हें उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा डी लिट की उपाधि से भी नवाजा गया है। 


कई पुस्तकों के हैं रचयिता


आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद जी महाराज द्वारा कई सारी पुस्तकें लिखी गई हैं। उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकें प्रकाशित भी हो चुकी हैं। इनमें सागर के मोती, सत्यम शिवम सुंदरम, प्रेरणा के पुष्प, जीवन दर्शन, अमृत गंगा, कल्पवृक्ष की छांव, ज्ञान सूत्र, पूर्णता की ओर, आत्म अनुभव साधना मंत्र, ब्रह्म ही सत्य है, आत्मा आलोक, गरिस्थ गीता, सँवारें अपना जीवन, आत्म अवबोध, मुक्तिपथ, दृष्टांत महासागर, आध्यात्मिक कथाएं, आत्मानुसंधान, अमृत प्रभाकरण आदि शामिल हैं। 


प्रभु प्रेमी संघ की स्थापना की


आचार्य महामंडलेश्वर द्वारा प्रभु प्रेमी संघ नामक एक संस्था की स्थापना की गई। यह प्रभु प्रेमी संघ स्वामी जी द्वारा निर्देशित किया जाता है। यह एक आध्यात्मिक संस्था है जो मानव में नैतिक मूल्यों का संरक्षण, पर्यावरण के प्रति जागरूकता तथा विश्व शांति के अनेक प्रयास करती रहती है। इस संस्था का मुख्य लक्ष्य आध्यात्मिक सांस्कृतिक चेतना को मनुष्य के मन में जगा कर संपूर्ण विश्व में चेतना का उत्थान करना है। 

इसके साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय रूप से विश्व में कई सर्वधर्म सम्मेलनों में भी इस संस्था की सक्रिय रूप से भागीदारी निश्चित होती है। यह संस्था पूरे विश्व के मानव समुदाय के प्रति निस्वार्थ सेवा की भावना से अपने कार्यों को संपन्न करती है। इसका उद्देश्य सभी धर्मों के लिए सहिष्णुता और भाईचारे के संदेश के साथ-साथ मानव जाति के लोगों के मन में सेवा की भावना पैदा करना है तथा प्राचीन धर्म ग्रंथों में निहित ज्ञान को प्रवचनों के माध्यम से मनुष्य के विचारों में अंतर्निहित करना है। आज इस संस्था की देश-विदेश में कई सारी शाखाएं मौजूद हैं। जो इस तरह के आध्यात्मिक उत्थान के कार्यों में कार्यरत है। आचार्य महामंडलेश्वर जी वर्तमान समय में  हरिद्वार में स्थित समन्वय सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं। 


इस तरह के निस्वार्थ भाव से मानव कल्याण के लिए कार्यरत स्वामी जी को कई सारे पुरस्कारों से अंतर्रष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है। इनमें चैंपियंस ऑफ चेंज (2019), SIES एमिनेंस अवार्ड (2019) तथा कैलिफोर्निया में अमेरिका के हिंदू पुनर्जागरण का पुरस्कार (2008) मुख्य रूप से शामिल हैं।